मोक्ष देती है आमलकी एकादशी

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फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘आमलकी एकादशी’ के नाम से जाना जाता हैं। एकादशी तिथि विष्णुप्रिया तो है ही, इसके अलावा इस एकादशी का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि इस दिन भगवान शिव मां पार्वती से विवाह के उपरांत पहली बार अपनी प्रिय काशी नगरी आए थे।

पुराणों में भगवान विष्णु ने कहा है कि जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं, उनके लिए आमलकी एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। इसके व्रत से भी सांसारिक दुःख दूर हो जाते है।

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इसलिए की जाती है आंवले वृक्ष की पूजा

आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का खास विधान हैं। पद्य पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के मुख से चंद्रमा के समान कांतिमान एक बिंदु धरती पर गिरा, उसी से आमलकी का महान दिव्य वृक्ष उत्पन्न हुआ, जो सभी वृक्षों का आदिभूत कहलाता है। भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना के लिए इसी समय अपनी नाभि से ब्रह्माजी को उत्पन्न किया। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, नाग तथा निर्मल अन्तःकरण वाले महर्षियों को ब्रह्माजी ने जन्म दिया। सभी देवताओं ने जब इस पवित्र वृक्ष को देखा तो उनको बड़ा विस्मय हुआ, इतने में आकाशवाणी हुई, महर्षियों, यह सर्वश्रेष्ठ आमलकी का वृक्ष है, जो भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इसके स्मरण मात्र से गोदान का फल मिलता है। स्पर्श करने से दोगुना तथा फल खाने से तिगुना फल प्राप्त होता है। इसके मूल में विष्णु, उसके उपर ब्रह्मा, तने में रूद, शाखाओं में मुनिगण, टहनियों में देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरूदगण और फलों में समस्त प्रजापति वास करते है। इसलिए यह सब पापों को हरने वाला परम पूज्य वृक्ष है।

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